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7-Aug-2020

रामविलास पासवान: सुर्ख़ियों के बावजूद ठौर की तलाश


1969 में पहली बार संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने वाले रामविलास पासवान ने न सिर्फ बिहार के राजनीतिक माहौल में खुद को स्थापित किया बल्कि भारतीय राजनीतिक परिपेक्ष्य में भी लगातार अहम भूमिका निभाते रहे हैं। शायद यही वजह है कि केंद्र में सरकार भले ही किसी की हो परन्तु पासवान किसी न किसी रूप से मंत्रिमंडल में शामिल होते रहे हैं। 5 जुलाई 1946 में बिहार के खगड़िया जिले में जन्मे रामविलास पासवान ने अपना छात्र जीवन बहुत ही संजीदगी से बिताया।

पटना विश्वविद्यालय से परास्नातक तक की पढ़ाई पूरी करने वाले पासवान शुरू से ही लोकनायक जयप्रकाश नारायण तथा राज नारायण के प्रशंसक रहे और इनके नक्शे कदम पर चलते हुए जल्द ही जनता दल के महासचिव पद पर नियुक्त किये गए। 1977 में पहली बार पासवान जनता पार्टी के टिकट पर निर्वाचित हुए, और फिर 1980, 1984, 1989, 1996, 1998, 2004, 2014 तथा 2019 में पासवान ने अपने संसदीय क्षेत्र हाजीपुर से जीत दर्ज की। रामविलास पासवान पहली बार 1989 में वीपी सिंह की सरकार में श्रम कल्याण मंत्री बने, फिर रेल मंत्री, टेलीकॉम मंत्री, कोयला मंत्री तथा 2004 के बाद यूपीए से जुड़कर रसायन एवं खाद मंत्री तथा इस्पात मंत्री का कार्यभार संभाला। 1993 में ही पासवान ने दलितों के उत्थान के लिए दलित सेना का गठन कर राजनीतिक सफ़र में लम्बी दौड़ लगाने कि अपनी मंशा व्यक्त कर दी थी। परन्तु दलित सेना राजनीतिक हाशिए पर आ गई, परन्तु पासवान ने हार नहीं मानी और अगले कई वर्षों तक अपनी जमीन मजबूत करने के लिए नीतीश-लालू का सहारा लिया, और फिर वर्ष 2000 में नीतीश से अलग होकर अपनी लोक जनशक्ति पार्टी का गठन कर लिया।

अगर पासवान के राजनीतिक सफर पर गौर करें तो पासवान राजनीति के एक ऐसे खिलाड़ी नजर आते हैं, जिन्होंने कभी लोकसभा चुनाव में जीत के अंतर का विश्व रिकॉर्ड बनाया तो कभी शून्य पर आउट हुए। एनडीए में आने से पहले की बात हो तो पासवान का यह सबसे बुरा वक़्त था। कांग्रेस गठबंधन के साथ चुनाव लड़ रही पासवान की लोजपा के लगभग सभी प्रत्याशियों की न सिर्फ जमानत जब्त हुई बल्कि पासवान खुद बड़े अंतर से हार गए। ऐसे में पासवान को कांग्रेस का साथ मिला और फिर एक बार पासवान राज्यसभा के जरिये सांसद बने। 2014 लोकसभा चुनाव से पूर्व पासवान मोदी लहर को भांपकर यूपीए का साथ छोड़ राजग गठबंधन में आ गए और पुन: एक बार केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल हुए।

अपने सफल राजनीतिक कैरियर के बावजूद पासवान कभी बिहार के मुखिया नहीं बन सके, जिसके लिए कई बार इन्होने जोर आजमाइश भी की। 2005 के फरवरी में हुए विधानसभा चुनाव में एक ऐसा मौका इनके हाथ लगा भी था। लोजपा के पास 29 सीट थी और सरकार किसी की नहीं बन रही थी। ऐसे में सबकी निगाहें पासवान पर टिकी थी परन्तु पासवान उसे भुनाने में नाकाम रहे, परिणाम यह हुआ कि दोबारा चुनाव के जरिए नीतीश की सरकार बनी।

अपनी चतुराई के कारण हमेशा केंद्र में भागीदारी रखने वाले पासवान फिलहाल एक ओर राजग को बिहार में पुनः स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं, तो दूसरी ओर अपनी पार्टी लोजपा को अपना उत्तराधिकारी देकर बेटे चिराग पासवान को बिहार की राजनीति का गुड़ सिखाने की कोशिश में लगे हैं।

#बिहार चुनाव